गैस टरबाइन से निकलने वाले धुएं में एक ऐसी समस्या छिपी होती है, जो दिखाई नहीं देती लेकिन पर्यावरण पर इसका असर गहरा होता है। यह समस्या है नाइट्रोजन ऑक्साइड यानी NOx उत्सर्जन। यही वह प्रदूषक है जो हवा की गुणवत्ता को खराब करता है और स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बनता है। पिछले कई वर्षों से Selective Catalytic Reduction यानी SCR सिस्टम इस चुनौती से निपटने का एक मजबूत तरीका रहा है। यह तकनीक हानिकारक गैसों को नाइट्रोजन और पानी जैसे अपेक्षाकृत सुरक्षित तत्वों में बदल देती है।
लेकिन SCR सिस्टम की सफलता सिर्फ तकनीक पर नहीं, बल्कि एक बेहद जरूरी शर्त पर निर्भर करती है। यह शर्त है एमोनिया का सही और समान रूप से एग्जॉस्ट गैस में मिलना। अगर यह मिक्सिंग असमान हो जाती है, तो रासायनिक प्रक्रिया अनिश्चित हो जाती है और उत्सर्जन नियंत्रण अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाता, Best Universities in India।
इसी चुनौती को केंद्र में रखते हुए Applied Thermal Engineering जर्नल में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण शोध सामने आया है। इस अध्ययन को KLU के इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े डॉ. श्रीनिवास राव सुन्कारा (एसोसिएट प्रोफेसर) और डॉ. बी. साई प्रसाद (प्रोफेसर) ने अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम के साथ मिलकर किया है।
इस शोध की खास बात यह है कि इसमें छोटी-मोटी तकनीकी सुधारों पर नहीं, बल्कि समस्या की जड़ को समझने पर जोर दिया गया है। शोधकर्ताओं ने भौतिक सिद्धांतों और उच्च स्तर की कंप्यूटेशनल सिमुलेशन तकनीकों का उपयोग करते हुए यह जानने की कोशिश की कि आखिर एमोनिया मिक्सिंग को ज्यादा प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है।
शोध के दौरान एक अहम समाधान सामने आया। एमोनिया इंजेक्शन के समय अगर नियंत्रित स्वर्ल यानी घुमावदार प्रवाह पैदा किया जाए, तो एग्जॉस्ट गैस खुद मिक्सिंग में मददगार बन जाती है। डॉ. श्रीनिवास के अनुसार, यह घूर्णन गति एमोनिया को डक्ट के पूरे हिस्से में स्वाभाविक रूप से फैलने में मदद करती है। इससे उन स्थानों पर अधिक या कम एमोनिया जमा होने की समस्या कम हो जाती है, जो आमतौर पर कैटेलिस्ट की कार्यक्षमता को कमजोर करती है।
इस तरीके में प्रवाह से लड़ने के बजाय, उसी प्रवाह का सही दिशा में उपयोग किया गया है। यह सोच इंजीनियरिंग में एक व्यावहारिक और टिकाऊ दृष्टिकोण को दर्शाती है।
शोध के परिणाम स्पष्ट और मापने योग्य रहे। कुछ खास स्वर्ल एंगल पर एमोनिया का वितरण काफी समान पाया गया। इसके साथ ही कैटेलिस्ट तक पहुंचने से पहले तापमान का वितरण भी ज्यादा स्थिर रहा। डॉ. बी. साई प्रसाद बताते हैं कि यह संतुलन बेहद जरूरी है, क्योंकि इससे रासायनिक प्रतिक्रियाएं ज्यादा भरोसेमंद होती हैं और सिस्टम की उम्र भी बढ़ती है।
जब फ्लो कंडीशन सही होती है, तो पूरी उत्सर्जन नियंत्रण प्रक्रिया ज्यादा प्रभावी और स्थिर बन जाती है। इसका सीधा मतलब है कम प्रदूषण, बेहतर प्रदर्शन और लंबे समय तक भरोसेमंद सिस्टम।
KLU कैंपस का इलेक्ट्रॉनिक्स एंड कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग ऐसे शोध कार्यों को लगातार प्रोत्साहित करता रहा है, जो बुनियादी इंजीनियरिंग समझ को वास्तविक दुनिया की समस्याओं से जोड़ते हैं। कंप्यूटेशनल मॉडलिंग, सस्टेनेबल सिस्टम्स, इंटेलिजेंट इंजीनियरिंग सॉल्यूशंस और इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च के माध्यम से विभाग ऐसा माहौल तैयार कर रहा है, जहां सोच-समझकर किया गया शोध तकनीकी प्रगति में बदल सके।
यह अध्ययन यह भी दिखाता है कि पर्यावरण से जुड़ी बड़ी समस्याओं के समाधान हमेशा शोर मचाने वाले बदलावों से नहीं आते। कई बार शांत, सटीक और वैज्ञानिक समझ पर आधारित सुधार ही सबसे बड़ा असर छोड़ते हैं। स्वच्छ हवा की दिशा में यह शोध एक ऐसा ही महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।